Uttarakhand: पहाड़ी वादियों में इन दिनों सियासत का तापमान अचानक बढ़ा हुआ है। गाँव-गाँव, कस्बे-कस्बे और सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक एक ही सवाल गूंज रहा है—
“क्या इस बार उत्तराखंड की राजनीति में कुछ वाकई अलग होने वाला है?”
इस सवाल की वजह बन रही है उत्तराखंड क्रांति दल (UKD) की बढ़ती सक्रियता और युवा चेहरे आशीष नेगी का उभरता प्रभाव। लंबे समय से हाशिये पर मानी जा रही UKD अब फिर से जमीन पर उतरती दिख रही है—और इस बार सिर्फ नारों के साथ नहीं, बल्कि सीधे जनता के दर्द और मुद्दों के साथ।
UKD की बढ़ी हुई सक्रियता: सिर्फ राजनीति नहीं, जमीनी लड़ाई
पिछले कुछ महीनों में uttarakhand -UKD की गतिविधियों पर नजर डालें तो साफ दिखता है कि पार्टी अब सिर्फ चुनावी मौसम की पार्टी नहीं रहना चाहती।
- गाँवों में जन संवाद यात्राएँ
- बेरोजगारी, पलायन और जंगलों से जुड़े मुद्दों पर धरना-प्रदर्शन
- वन्यजीव हमलों को लेकर प्रशासन के खिलाफ खुली नाराज़गी
- युवाओं और महिलाओं के साथ सीधे संवाद
UKD लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि वह सत्ता के लिए नहीं, बल्कि उत्तराखंड के अस्तित्व और अस्मिता के लिए राजनीति कर रही है।
“पहाड़ में रोज़गार, पहाड़ के लोगों को” – UKD का बड़ा मुद्दा
UKD का सबसे मजबूत और संवेदनशील मुद्दा है—
स्थानीय लोगों को स्थानीय रोजगार
पार्टी का आरोप है कि:
- पहाड़ में चल रही कई परियोजनाओं में बाहरी लोगों को रोजगार दिया जा रहा है
- स्थानीय युवाओं को काम नहीं मिलने से पलायन बढ़ रहा है
- ठेकेदारी सिस्टम में भी बाहरी ठेकेदारों का दबदबा है
ग्रामीण इलाकों में यह बात अब सिर्फ शिकायत नहीं, बल्कि गुस्से में बदलती दिख रही है। कई युवाओं का कहना है कि “हमारे पहाड़ पर काम है, लेकिन हमारे लिए नहीं।”
जंगली जानवरों का आतंक: सरकार पर सबसे बड़ा सवाल
उत्तराखंड के गांवों में आज सबसे बड़ा डर है—
जंगली जानवरों का हमला
- गुलदार, हाथी और भालू के हमलों में
- कई लोग घायल हुए
- कई लोगों की जान गई
- खेतों में खड़ी फसलें बर्बाद
- किसान खेती छोड़ने को मजबूर
UKD इस मुद्दे पर सीधे सरकार को घेर रही है। पार्टी का कहना है कि
“जब जानवर इंसान पर भारी हो जाएँ और सरकार खामोश रहे, तो सवाल उठना जरूरी है।”
ग्राउंड लेवल पर यह मुद्दा इतना संवेदनशील है कि कई गांवों में लोग रात में खेतों की ओर जाने से डरते हैं।
भ्रष्टाचार और सिस्टम से नाराज़गी
UKD लगातार यह भी आरोप लगा रही है कि:
- विकास योजनाओं में भ्रष्टाचार हो रहा है
- पहाड़ी इलाकों के लिए आने वाला पैसा नीचे तक नहीं पहुँचता
- सरकारी सिस्टम आम आदमी की सुनने को तैयार नहीं
यह नाराज़गी अब सिर्फ राजनीतिक मंचों तक सीमित नहीं है। चाय की दुकानों, पंचायत बैठकों और सोशल मीडिया पर भी यही बातें खुलकर सामने आ रही हैं।
आशीष नेगी: एक उभरता चेहरा, नई उम्मीद?

UKD के भीतर और बाहर, Ashish Negi को एक ऐसे नेता के तौर पर देखा जा रहा है जो:
- ज़मीन से जुड़ी भाषा बोलता है
- युवा और पहाड़ी मुद्दों को खुलकर उठाता है
- मीडिया से ज्यादा जनता के बीच रहना पसंद करता है
उनकी सभाओं और जनसंवाद कार्यक्रमों में भीड़ का बढ़ना यह संकेत देता है कि लोग विकल्प तलाश रहे हैं।
क्या इस बार चुनाव में होगा कुछ खास?
यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि UKD सत्ता तक पहुँचेगी या नहीं, लेकिन इतना साफ है कि:
- जनता का मूड बदल रहा है
- पारंपरिक दलों से सवाल पूछे जा रहे हैं
- पहाड़ी मुद्दे फिर से केंद्र में आ रहे हैं
अगर यह माहौल ऐसे ही बना रहा, तो आने वाले चुनावों में UKD एक बड़ा फैक्टर बनकर उभर सकती है।
उत्तराखंड की राजनीति एक बार फिर चौराहे पर खड़ी दिख रही है।
रोज़गार, पलायन, जंगली जानवर, भ्रष्टाचार और स्थानीय अधिकार—ये मुद्दे अब सिर्फ भाषणों तक सीमित नहीं रहे।
UKD और आशीष नेगी इन मुद्दों को जिस तरह लगातार उठा रहे हैं, उससे साफ है कि इस बार चुनावी लड़ाई सिर्फ सत्ता की नहीं, बल्कि पहचान और हक़ की भी होगी।
अब देखना यह है कि यह बदली हुई हवा सिर्फ माहौल तक रहती है या चुनावी नतीजों में भी दिखाई देती है।
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